
सौर ज्वाला (Solar Flare) को समझना: सौरमंडल के सबसे शक्तिशाली विस्फोट
पृथ्वी से 15 करोड़ किलोमीटर दूर, हमारा सूर्य प्रकाश और ऊष्मा प्रदान करता है जो हमारे ग्रह पर जीवन को बनाए रखता है। फिर भी, इस जीवनदायी सतह के नीचे अकल्पनीय पैमाने पर विस्फोट होते रहते हैं।
सौर ज्वाला (Solar Flare) हमारे सौरमंडल में देखी जाने वाली सबसे हिंसक ऊर्जा रिहाई है। महज कुछ मिनटों से लेकर घंटों में, ये घटनाएं 10^25 जूल ऊर्जा छोड़ती हैं—जो एक खराब परमाणु बमों या पृथ्वी की पूरी वार्षिक ऊर्जा खपत के लगभग दस लाख गुना के बराबर है।
हमें इसकी चिंता क्यों करनी चाहिए? क्योंकि ये केवल दूर की खगोलीय आतिशबाजी नहीं हैं। 2003 के 'हैलोवीन सोलर स्टॉर्म' ने स्वीडन में बिजली गुल कर दी थी और उपग्रहों को नुकसान पहुंचाया था। हमारी आधुनिक दुनिया, जो तकनीक पर निर्भर है, इसके लिए संवेदनशील है।
1. सौर ज्वाला कैसे काम करती है और इसका वर्गीकरण
1-1. सौर विस्फोटों के पीछे की भौतिकी
सूर्य के केंद्र (Core) में, जहां तापमान 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, हाइड्रोजन परमाणु 'नाभिकीय संलयन' (Nuclear Fusion) के माध्यम से हीलियम में बदल जाते हैं। यह ऊर्जा सतह तक आने में हजारों साल लेती है, जिससे शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Fields) बनते हैं।
एक रबर बैंड के बारे में सोचें जिसे बार-बार मोड़ा जा रहा हो—अंततः, वह टूट जाएगा। सूर्य की चुंबकीय रेखाएं भी ऐसा ही व्यवहार करती हैं। सूर्य का घूर्णन (Rotation) ध्रुवों और भूमध्य रेखा पर अलग-अलग गति से होता है, जिससे ये रेखाएं उलझ जाती हैं।
सौर कलंक (Sunspots)—सूर्य की सतह पर दिखने वाले काले धब्बे—वह जगह हैं जहां ये चुंबकीय रेखाएं बाहर निकलती हैं। इन धब्बों में पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से लगभग 10,000 गुना अधिक मजबूत चुंबकीय क्षेत्र होते हैं। जब ये क्षेत्र बहुत अधिक उलझ जाते हैं, तो वे टूटते हैं और भारी मात्रा में ऊर्जा छोड़ते हैं, जिसे हम सौर ज्वाला कहते हैं।

1-2. सौर ज्वाला बनाम कोरोनल मास इजेक्शन (CME)
वैज्ञानिक भी कभी-कभी सौर ज्वाला और कोरोनल मास इजेक्शन (CME) को एक ही मान लेते हैं, हालांकि ये अलग-अलग घटनाएं हैं।
अगर सौर ज्वाला 'बिजली की चमक' है, तो CME 'तूफान' है। सौर ज्वालाएं प्रकाश की गति से चलती हैं और केवल 8 मिनट 19 सेकंड में पृथ्वी तक पहुंच जाती हैं। दूसरी ओर, CME अरबों टन प्लाज्मा का बादल है जो सूर्य से बाहर फेंका जाता है और इसे पृथ्वी तक पहुंचने में 15 घंटे से लेकर कई दिन लग सकते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जबकि 70% बड़ी ज्वालाएं CME को ट्रिगर करती हैं, लगभग 30% CME बिना किसी सौर ज्वाला के भी होते हैं। अंतरिक्ष के मौसम की सटीक भविष्यवाणी के लिए इस अंतर को समझना महत्वपूर्ण है।

| उत्सर्जन का प्रकार | गति / समय | पृथ्वी पर मुख्य प्रभाव |
|---|---|---|
| रेडियो बर्स्ट (एक्स-रे) | प्रकाश की गति (~8 मिनट) | रेडियो ब्लैकआउट (संचार में बाधा) |
| सौर प्रोटॉन घटनाएं | प्रकाश की गति के करीब (~30 मिनट) | अंतरिक्ष यात्रियों और उड़ानों के लिए विकिरण का खतरा |
| कोरोनल मास इजेक्शन (CME) | 16 लाख+ किमी/घंटा (न्यूनतम 15 घंटे) | भू-चुंबकीय तूफान, बिजली ग्रिड की विफलता |
1-3. सौर चक्र (Solar Cycle)
सूर्य की गतिविधि हर 11 साल के चक्र में बदलती रहती है। 'सोलर मैक्सिमम' (Solar Maximum) के दौरान, सनस्पॉट की संख्या 200 से अधिक हो सकती है और सौर ज्वालाएं अक्सर होती हैं। इसके विपरीत, 'सोलर मिनिमम' के दौरान सूर्य शांत रहता है। वर्तमान में हम 25वें सौर चक्र में हैं, जिसमें गतिविधि बढ़ रही है।

2. पृथ्वी और भारत पर प्रभाव

2-1. संचार और जीपीएस (GPS) में बाधा
कल्पना कीजिए: हवाई यातायात नियंत्रकों का उड़ानों से संपर्क टूट जाता है। आपका जीपीएस आपको आपके वास्तविक स्थान से 100 मीटर दूर दिखाता है। यह कोरी कल्पना नहीं है।
आयनोस्फीयर (Ionosphere), जो पृथ्वी के ऊपर संचार संकेतों को परावर्तित करता है, सौर एक्स-रे से प्रभावित होता है। इसे डेलिंगर प्रभाव (Dellinger effect) कहा जाता है, जो शॉर्टवेव रेडियो को बंद कर सकता है। भारत में, जहां कृषि और नेविगेशन के लिए जीपीएस का उपयोग बढ़ रहा है, यह व्यवधान महत्वपूर्ण हो सकता है।
2-2. बिजली ग्रिड (Power Grid) पर खतरा
जब CME पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराता है, तो यह बिजली लाइनों में अतिरिक्त करंट (GICs) पैदा कर सकता है। 1989 में कनाडा के क्यूबेक में इसी कारण 9 घंटे तक बिजली गुल रही थी। भारत का विशाल पावर ग्रिड भी बड़े सौर तूफानों के दौरान संवेदनशील हो सकता है, इसलिए ग्रिड ऑपरेटर इसकी निगरानी करते हैं।
2-3. क्या भारत में अरोरा (Aurora) दिखाई देता है?
अरोरा बोरेलिस (उत्तरी रोशनी) आमतौर पर ध्रुवीय क्षेत्रों में दिखाई देती है। लेकिन, अत्यधिक शक्तिशाली सौर तूफानों के दौरान, यह कम अक्षांशों तक फैल सकती है।
मई 2024 के ऐतिहासिक भू-चुंबकीय तूफान के दौरान, लद्दाख के हानले (Hanle) में भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA) की वेधशाला से दुर्लभ लाल रंग का अरोरा देखा गया था। यह भारत के लिए एक दुर्लभ और अद्भुत खगोलीय घटना थी।
3. भविष्यवाणी और आदित्य-L1 (Aditya-L1) मिशन

3-1. वर्गीकरण और चेतावनी
सौर ज्वालाओं को उनकी ताकत के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है: C-श्रेणी (कमजोर), M-श्रेणी (मध्यम), और X-श्रेणी (सबसे शक्तिशाली)। X-श्रेणी की ज्वालाएं ही पृथ्वी पर बड़ा प्रभाव डालती हैं।
आज, इसरो (ISRO) और नासा जैसी एजेंसियां 24/7 सूर्य पर नजर रखती हैं। मशीन लर्निंग मॉडल अब 24 घंटे पहले ही ज्वालाओं की भविष्यवाणी करने में सक्षम हो रहे हैं।
3-2. भारत का 'आदित्य-L1' मिशन
भारत ने सूर्य का अध्ययन करने के लिए अपना पहला समर्पित मिशन, आदित्य-L1 (Aditya-L1) लॉन्च किया है। यह लैग्रेंज पॉइंट 1 (L1) पर स्थित है और सूर्य की परतों, सौर हवाओं और CME का अध्ययन कर रहा है। यह मिशन भारत को अंतरिक्ष के मौसम की भविष्यवाणी करने में आत्मनिर्भर बना रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: क्या सौर ज्वाला से पृथ्वी खत्म हो सकती है?
उत्तर: नहीं। पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र और वायुमंडल हमें सीधे नुकसान से बचाते हैं। हालांकि, हमारी तकनीक (सैटेलाइट, ग्रिड) को नुकसान हो सकता है।
प्रश्न: क्या मेरा स्मार्टफोन खराब हो जाएगा?
उत्तर: जमीन पर मौजूद इलेक्ट्रॉनिक्स सीधे खराब नहीं होंगे। लेकिन मोबाइल नेटवर्क और जीपीएस सिग्नल में कुछ समय के लिए दिक्कत आ सकती है।
प्रश्न: हम कितनी देर पहले इसकी भविष्यवाणी कर सकते हैं?
उत्तर: वर्तमान तकनीक 24 से 48 घंटे पहले संभावित चेतावनी दे सकती है। आदित्य-L1 जैसे मिशन इसमें और सुधार कर रहे हैं।
संदर्भ और स्रोत
- ISRO - Aditya-L1 Mission: https://www.isro.gov.in/
- NASA Solar Dynamics Observatory (SDO)
- NOAA Space Weather Prediction Center
- Indian Institute of Astrophysics (IIA) - Hanle Observatory
